ईश्वर क्या है ??
ईश्वर क्या है ?
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ईश्वर वह सर्वोच्च शक्ति है जिसे संसार या नश्वर जगत चलाएमान है। कई धर्मों में इसे परिभाषित करने का प्रयास किया गया है । परंतु ये इतना विस्तृत है कि इसे छोटे से अर्थ मे बाँधना असंभव लगता है। परमेश्वर या ईश्वर की परिकल्पना ब्रह्मांड की संरचना से जुड़ी हुई है । यह ब्रह्मांड पाँच मूल तत्वों के मिश्रण का आधार है। जिस प्रकार ब्रह्मांड अनंत और व्यापक है इसकी संरचना का अनुमान करना असंभव व अकल्पनीय अवधारणा समान लगता है। जिस परम शक्ती से उर्जान्वित हो यह ब्रह्मांड स्वा चलायमान है , वह परम शक्ती ही " ईशवर" है।
ईशवर को निराकार ,निर्विकार,निर्विकल्प रूप में व्याखित किया गया है ।ब्रह्मांड , पृथ्वी या सृष्टी
की संरचना में ईशवर तत्व को समाहित कर इस सृष्टी को नियमित ,स्वाचालित तथा व्यवस्थापित करने का उद्येशय समाहित है
यदी ईश्वर शब्द के शाब्दिक अर्थ से परे होकर इसको व्यापक अर्थ में समझने का प्रयास करे तो पाएंगे की...ईशवर परम शक्तिशाली परा शक्ति जिससे जगत संचालित होता है , जिसके सम्मोहन,आकर्षण से जीव जगत ही नही बल्कि मूर्त ,अमूर्त, स्थूल और सूक्ष्म ,चर ,अचर संपूर्ण सृष्टि एक स्वचलित रूप में संचालित हो रही है।
ईशवर का धार्मिक या संप्रदाय विशेष रूप एक भ्रामक विचारधारा है ,जो कल्पनामात्र दैविय रूप में व्याखित या प्रचारित की गई है...ईशवर को विशवास के रूप में मनुष्य की आत्मा व उसके अस्तित्व से जोड़ कर व्याखित कर उतरदायित्व के रूप में स्वीकरोक्ति प्रदान की गई है।
हिंदु धर्म में वेद ,उपनिषद के आधार पर ईशवर तत्व को परं ब्रंह्म कहा गया है... ब्रंह्म आथार्त ब्रंह्माड का मूल आधार ,जिसका ना कोई रूप है और ना हि इसे किसी रूप में बाँधा जा सकता है । यह निर्विकार अाद्योपान्त जीवन के सूक्ष्तम कण से अनंत तक ब्रंह्म रूप में विद्यमान है, सृष्टि की परिकल्पना भी इसी से संभव है और संपूर्णत की स्थिती में विध्वंस का कारक भी यही होता है। दोनो स्थिती में परं ब्रह्मं तत्व जिसे ईशवर कह सकते है संतुलन बनाए रखता है जिससे सृष्टि का स्वचलित यंत्र चलायमान बना रह सके।
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वर्तमान समय में ईश्वर की व्याख्या
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आज के युग में इस अदृश्य शक्ति को अनेक नाम ईश्वर, भगवान ,गॉड ,खुदा ,परमात्मा ,प्रभु
के नाम से हम सभी जानते हैं ।मानव प्रगति पथ पर दौड़ रहा है आज वह जगत में रचियता बन बैठा है ।तरह-तरह की चीजों की रचना कर वह अपनी तुलना भगवान और ईश्वर से करने लगता है ।ईश्वर की बनाई भी बहुमूल्य प्रकृति और धरा को नष्ट करने पर तुला है ।अनेक ऐसी घटनाएं सामने आती हैं कि मनुष्य का वैज्ञानिक अनुसंधान असफल हो जाता है । जैसे प्राकृतिक शक्तियां भूकंप, सुनामी , तूफान के आगे मनुष्य असफल हो जाता है और अनेक हानियां झेलने को मजबूर हो जाता है । उस समय उसका भगवान की सत्ता में विश्वास अटल हो जाता है। अतः भगवान या ईशवर जिस तरह से रचना करता है उसी तरह संहार भी करता और पालन भी करता है। अत: यहाँ अनेक प्रशन या विचार मन ,मस्तिष्क में उभरने लगते है ।
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ईश्वर का साकार रूप
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अनेक बार ऐसे प्रश्न हमारे सामने आते हैं कि क्या ईश्वर है? यदि ईश्वर है तो वह दिखाई क्यों नहीं देता? हम उसका साक्षात्कार क्यों नहीं कर सकते ?
इसी प्रश्न के उत्तर में सदियों से अनेक ऋषियों मनीषियों ,दार्शनिकों और धर्म पुत्रों ने अपने अपने तरीके से इसे सिद्ध करने की कोशिश की है परंतु वह क्या इस गहन ईश्वर के सत्य को जान पाए?
अंततः यह प्रकृति ही ईश्वर के रूप में प्रमुख शक्तिशाली है जिससे यह संसार चलाएमान है।जिस जिस शक्ति से अभिभूत होकर हम इस मृत प्राय जगत में शाश्वत बने हुए है। वह परम ताकत ही ईश्वर है।
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ईश्वर की सत्यता
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हम भगवान और ईश्वर का साक्षात रूप में दर्शन तब प्राप्त करता है जब हम अपने अंदर इसे ढूंढने का प्रयास करता है। हमारा शरीर ईश्वर की वह कीर्ति है जो इस संसार की एक बहुमूल्य सत्यता है।
अतः ईश्वर की कीर्ति मनुष्य ,प्रकृति, पशु पक्षी सभी ब्रह्मांड में ईश्वर का वरदान है । यह वह परम शक्ति है जो हमें हमारे अस्तित्व का बोध कराती है और संसार को निरंतर चलाएमान रखती है। ईश्वर ही वह परम शक्ति है जो ब्रह्मांड में सब कुछ नियंत्रित करता है ।
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ईश्वर एक रचयिता
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ईश्वर वह परम शक्ति है जिससे यह ब्रह्मांड चल रहा है । ग्रह, नक्षत्र ,तारे ,पृथ्वी जीवन ,मृत्यु सब कुछ उस परम शक्ति के हाथ में है ।वही हमें हँसाता है और वही हमें रुलाता है वही रचना करता है और वही संहार करता है।
इसीलिए गीता में कहा गया है सब जन्म मुझी से पाते हैं फिर लौट मुझी में आते हैं। अतः जन्म और मृत्यु का कालचक्र चलता रहता है इस ब्रह्मांड की यह सबसे अनोखी सत्यता है कि जीव से जीव का सृजन स्वचलित सृजन व निर्माण की शक्ति ही ईश्वर की अलौकिक शक्ति है। फूल से फल का निर्माण और फल से बीज का निर्माण ही वह मुख्य सार है । जिससे इस धरा पर जीवन चिरकाल से चल रहा है। इससे ही हम मनुष्य को यह अनुभूति होती है कि ईश्वर है-- जो हमें जन्म देता है और पालता है और फिर समय पूरा हो जाने पर हमारे नश्वर शरीर को नष्ट कर देता है । परंतु जीवन नष्ट नहीं होता जीवन निरंतर चलता रहता है ।उसी प्रकार जिस तरह ईश्वर शाश्वत सत्य निरंतर हमारे साथ चलता रहता है।
अतः ईश्वर शाश्वत सत्य है ,जो ना जन्म लेता है। ना कभी मृत्यु को प्राप्त होता है ।ना कभी नष्ट होता है ना कभी निर्माण होता है । वह एक शक्ति है ----शक्ति जैसे कि विद्युत की तरह। विद्युत वह शक्ति है जो ना तो नष्ट होती है और ना ही निर्माण किया जाता है । हर छोटे से छोटे अणु में छुपी हुई शक्ति है। जो स्वयं ही अपने आप में परिपूर्ण है ।
मनीषा सुमन
very impressive writing
ReplyDeletenice writing
ReplyDeleteGod..The correct explanation is right here..It's amazing The real science behind the God..the real truth..You have amazingly explained it.
ReplyDeleteईश्वर अनिवर्चनीय है बावजूद इसके आपने परमात्मा के सगुण व निर्गुण रूप का चित्रण तथा वर्णन बखूबी किया है।
ReplyDelete🙏🙏🌹🌹
बहुत बहुत धन्यवाद
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