आध्यातम :- नारी सृष्टी का मूल
नारी सृष्टि का मूूल
नारी तू नरायणी
वेद वेदांत साहित्य व अन्य प्रमाण से यह सर्वविदित है कि नारी सृष्टि का मूल आधार ही नहीं बल्कि पालक व संहारक विभिन्न शक्ति स्वरूपों में विद्यमान हैं। माता दुर्गा को इस सृष्टि की आद्या शक्ति अर्थात् आदि शक्ति कहा गया है। प्रकृति स्वरूपा नारी को ईश्वरीय शक्ति का पर्याय मानते हुए पूजनीय वंदनीय स्थान दिया गया है । नारी सृष्टि की सृजनकर्ता और पालक के रूप में व्याख्ति हैं । कहीं धन वैभव की अधि़श्राष्ठी है , तो कहीं अन्नपूर्णा, कहीं ज्ञान दायिनी सरस्वती के रूप में विद्यमान हैं ,तो कहीं संहारक शक्ति स्वरूप चंडी का रूप ले ब्रह्मांड में संतुलन का कारक बनी हुई है। इन सभी के समस्त स्वरूपों को स्वयं में समाहित करती आदि शक्ति लोक कल्याणकारी मां दुर्गा के स्वरूपों की व्याख्या करते हुए कहा गया है।
《त्वयेतद्धार्यते विश्वं त्वयेतत् सृज्यते जगत।
त्वयेतत् पाल्यते देवी त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥७५॥
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥७६
अर्थात
""हे ! जगन्नमई देवी इस जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टि रूपा हो और पालनकाल में स्थिति रूप में हो ।
"हे ! जगन्नमई मां तुम कल्पांत के समय में संहार रूप धारण करने वाली हो।।""
अतः इस ब्रम्हांड से पहले अनंत अंधकार में विश्व जननी परा शक्ति श्री दुर्गा से ही शब्द सृष्टि की उत्पत्ति संभव हुई है । जब शिव में शक्ति का प्रवेश हुआ तब नारीत्व का सृजन संभव हुआ और शिव और शक्ति के मिलन से अर्धनारीश्वर रूप का प्रदुभाव हुआ । पुरुषत्व श्वेत एवं नारी तत्व रक्त वर्ण है इन्हीं के सम्मिलन से कला की उत्पत्ति हुई और काम कला तथा नाद अथवा बिंदु के योग से ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि उत्पन्न हुई है। यह त्रिगुनात्मक शक्ति को आज के आधुनिक सांइस के तत्वों के संदर्भ में देखते है परंतु यह त्रिगुणात्मक तत्व इससे कहीं उपर और विस्तृत दृष्टवय होतें है।
《प्रधानं त्रिगुणमचेतनं स्वतन्त्रं जगत्कारणम्
अर्थात् त्रिगुण प्रधान (आद्य प्रकृति) स्वतन्त्र रूप से जगत का कारण है।》
ब्रह्मांड का संचालन सुचारु रूप से चलाने के लिए तीन प्राकृतिक गुणों की सत्व ,राजस् तथा तामस की उत्पत्ति हुई ।
**सत्व गुण सबसे सूक्ष्म तथा अमूर्त है तथा दैवीय गुण के निकट है.... प्रसन्नता,संतुष्टि,धैर्य ,क्षमा आदि।
**तमस गुण अंधकार,आलस,लोभ, सांसरिक इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
**राजस गुण उर्जा का संचरण करने वाला कर्म
प्रधान गुण है, यदी सात्विक गुण की प्रबलता होगी तो सत्व ऊर्जा का संचारित होगी और यदी तामसिक हो तो तम प्रधान कर्म संचरित होगें।
यह त्रिगुणात्मक शक्ति जिसकी अधिश्राष्ठी
त्रि-देवियों की संरचना से संभव हो पाई । महालक्ष्मी भगवान विष्णु के अंतःकरण की शक्ति ब्राह्मंड के पालक तथा संरक्षण कार्य में निर्मित हुई जिसका संबंध उल्लेखित है।
* सत्वगुण जिससे महामाया शक्ति ने भगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्मा जी को प्रकट किया जिससे ब्रह्मांड निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।
*दूसरा गुण राजस जिस की अधिष्ठात्री देवि बुद्धि, विवेक,चेतना का बहुआयमी विकास होता है। इस अवस्था का संचालन और नियंत्रण महासरस्वती के रूप मे करती है।
* तीसरा गुण तामस जो विनाश या संहार की शक्ति से उद्वेलित है। जब जब विकास विरोधी दुष्ट अतिवादी के पराभव हेतु शिव संहारक माँ काली रूप में नियंत्रित करती है।
सृष्टि की इन तीन अवस्थाओं में .....प्रथम चरण में ब्रम्हा जी सृष्टि रचना में लीन थे , तो मधु कैटव दो रक्षसों द्वारा उन्हे मारने के योजना और सृष्टि रचना में बाधा पहुँचाने के विनियोग करने के कारण, शक्ति महामाया ने योगनिंद्रा का त्याग कर उन्हे मार डाला।
सृष्टि के दुसरे चरण में जब सभ्यता का विकास हो जाता है और मनुष़्य स्वा से स्वंय की रचना व विकास में अग्रसित हो जाता है तो अनेक जटिलताएं सामने सामने आती है।
तीसरी अवस्था समाज की विकसित अवस्था जहाँ मानव सभ्यता (आर्यों ) को शुंभ निशुंभ नामक अतिवादी शक्ति को नष्ट कर सभ्यता की रक्षा का प्रयोजन जगन्मयी संहारक माता दुर्गा द्वारा किया गया।
विश्व जननी माँ दुर्गा का अविर्भाव समय समय पर पृथ्वी पर अत्याचारीयों राक्षसों से पीड़ित समुदाय को मुक्ति और सम्मान दिलाने हेतु होता है। यह इस बात का भी सूचक है पृथ्वी ही नही बल्कि अंतर्मन में भी उत्पन्न होने वाले विकारो पर विजय प्राप्त करने का आधार है।
आधुनिक सांईस भी सृष्टि रचना के पीछे जिन सूक्ष्म कणों का उल्लेख करती है वह...इलेक्ट्रन, प्रोटोन, न्यूट्रन और जो फोर्स इनके बीच समन्वय स्थापित करती है वह मेसन्स,ग्लुओन्स और क्वाकर्स । उसी प्रकार जब तीनो घटक तत्व सत्व,रज,एंव तम अंतक्रिया में लीन हो लगातार बदलते है और संतुलन बनाए रखते है । जैसे ही अंतक्रिया का सामंजस्य टूटता है विकास की प्रकिया शने शने स्वत: स्फूर्त हो जाती है।
प्रधान के सामंजस्य का टूटना और सृष्टि निर्माण की घटना कुछ आधुनिक बिग बैंग सिद्धाँत या क्वांटम फिजीक्स से कर सकते है, और इससे कहीं विस्तृत अध्ययन साँख़्य के चौबीस तत्वों और शैव दर्शन के 36 तत्वों की विस्तृत वयाख्या से मानव रचना में तत्वों की भूमिका को समझ सकते है।
पुराण साहित्य ....देवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, मतस्य पुराण में शक्ति के माहात्मय का वर्णन है। मार्कण्डेय मुनी के वर्णन से स्पष्ट है कि महा शक्ति अनेकानेक रूपो में अवतरित हो नाना प्रकार की लीलाएं रचती रहती है।आरम्भ काल में उर्जा की आवश्यकता हेतू सूर्य देव की रचना हुई जो इस सृष्टि का आधार शक्ती हैं। कालांतर में वेद व्यास द्वारा आदि शक्ति के विषय में जिज्ञासा तथा जानने की इच्छा ने भगवान शिव ने आद्या शक्ति से उनका परिचय करवाया.... शक्ति की उपासना कर व्यास जी ने भगवती की आज्ञा पाकर ब्रह्म लोक में प्रवेश कर वेदो से साक्षात्कार किया... जहाँ से देवी महात्मय का दिव्य ज्ञान का ज्ञान उदित हुआ।
अत: चारो वेद के अनुसार के अनुसार देवी पराब्रह्म तत्व के रूप में सृष्टी में व्यापत है... विश्व के सृजन, पालन एंव संहार तीनो विशिष्टि कार्यो में ब्रह्मा -विष्णु -शंकर अपने अपने स्वभाव के अनुसार आपकी इच्छा से ही कार्यरूप में लीला रच रहे हैं तथा आप पर नियंत्रण रखनेवाला कोई कारक इस ब्रह्मांड में नही है। भगवान विष्णु ,ब्रह्मा, शंकर भी आपकी आराधना में सवर्दा तल्लीन रहते हैं ।यह प्रश्न इतना जटिल था ,अतः देवी नाना रूपों में प्रकट होंकर व्यास मुनी के मन में उठ रही जिज्ञासा का निवारण करते हुए नाना रूपों में प्रकट हुईं और व्यास मुनी को संशय मुक्त किया ...वेद मुनि ने वेदों की ऋचाओं में देवी महात्मय का बखान कर दिव्य ज्ञान से जगत को अवगत अवगत कराया । जो देवी महातम्य के रूप में जग में व्याप्त हो कल्याणकारी बना हुआ है।
मनीषा सुमन

This is really amazingly written.It is so deep and correctly explained.
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