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Showing posts from May, 2020

ईश्वर क्या है ??

ईश्वर क्या है ? ***************** ईश्वर वह सर्वोच्च शक्ति है जिसे संसार या नश्वर जगत  चलाएमान है। कई धर्मों में इसे परिभाषित करने का प्रयास किया गया है । परंतु  ये इतना विस्तृत है कि इसे छोटे से अर्थ मे बाँधना असंभव लगता है। परमेश्वर या ईश्वर की परिकल्पना ब्रह्मांड की संरचना से जुड़ी हुई है । यह ब्रह्मांड पाँच मूल तत्वों के मिश्रण का आधार है। जिस प्रकार ब्रह्मांड अनंत और व्यापक है इसकी संरचना का अनुमान करना असंभव व अकल्पनीय अवधारणा समान लगता है। जिस परम शक्ती से उर्जान्वित हो यह ब्रह्मांड स्वा चलायमान है , वह परम शक्ती ही " ईशवर"  है। ईशवर को निराकार ,निर्विकार,निर्विकल्प रूप में व्याखित किया गया है ।ब्रह्मांड , पृथ्वी या सृष्टी की संरचना में ईशवर तत्व को समाहित कर इस सृष्टी को नियमित ,स्वाचालित तथा व्यवस्थापित करने का उद्येशय समाहित है यदी ईश्वर शब्द के शाब्दिक अर्थ से परे होकर इसको व्यापक अर्थ में समझने का प्रयास करे तो पाएंगे की...ईशवर परम शक्तिशाली परा शक्ति जिससे जगत संचालित होता है , जिसके सम्मोहन,आकर्षण से जीव जगत ही नही बल्कि मूर्त ,अमूर्त, स्थूल और सूक्ष्म ,चर ,अ...

आध्यातम :- शिव तत्व

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पुराण/ शिव तत्व ****************  भारतीय जीवन दर्शन और भक्ति मूलक ग्रंथों में पुराण अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है ।यदि लिंग पुराण साहित्य और जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हैं तो भारतीय पुराण साहित्य में 18 पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को व्यक्त किया गया है । जिसमें पाप पुण्य धर्म अधर्म ,कर्म अकर्म, को आधुनिक जीवन के परिपेक्षय में परिभाषित कर मार्गदर्शन प्रदान करने का कार्य किया गया है।   भारतीय दर्शन में ब्रह्म के दो स्वरूपों की वयाख्या पाई जाती है । एक निर्गुण अर्थात निराकार और दूसरा सगुण आथार्त साकार रूप में ईश्वर तत्व को दर्शाया गया है । परंतु मूलता यह शक्ती एक ही जिसका अनेक रूप में वर्णन कर परा शक्तियों को परिभाषित  कर समझने का प्रयास किया है। पुराण साहित्य सगुण शक्ति से प्रेरित अध्यात्म  के रूप में अवतारवाद को परिभाषित करता अंधकार से प्रकाश की ओर मानव के मार्ग को प्रशस्त करता है । महर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना की है । पुराण प्राचीन काल से आज तक रोचक मानव जीवन मूल्यों से हमें बांधे परंपरा निर्वाहन का मार्ग प्रशस्त करते आ रहें है।   शिव तत्व ----...

आध्यातम :- नारी सृष्टी का मूल

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नारी सृष्टि  का मूूल नारी तू नरायणी वेद वेदांत साहित्य व अन्य प्रमाण से यह सर्वविदित है कि नारी सृष्टि का मूल आधार ही नहीं बल्कि पालक व संहारक विभिन्न शक्ति स्वरूपों में विद्यमान हैं।  माता दुर्गा को इस सृष्टि की आद्या शक्ति अर्थात् आदि शक्ति कहा गया है।  प्रकृति स्वरूपा नारी को ईश्वरीय शक्ति का पर्याय मानते हुए पूजनीय वंदनीय स्थान दिया गया है । नारी सृष्टि की सृजनकर्ता और पालक के रूप में व्याख्ति हैं । कहीं धन वैभव की अधि़श्राष्ठी है , तो कहीं अन्नपूर्णा, कहीं ज्ञान दायिनी सरस्वती के रूप में विद्यमान हैं ,तो कहीं संहारक शक्ति स्वरूप चंडी का रूप ले ब्रह्मांड में संतुलन का कारक बनी हुई है।  इन सभी के समस्त स्वरूपों को स्वयं में समाहित करती आदि शक्ति लोक कल्याणकारी मां दुर्गा के स्वरूपों की व्याख्या करते हुए कहा गया है। 《 त्वयेतद्धार्यते विश्वं त्वयेतत् सृज्यते जगत।  त्वयेतत् पाल्यते देवी त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥७५॥ विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।  तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥७६ अर्थात ""हे ! जगन्नमई  देवी इस जगत की उत्पत्ति के सम...